प्लास्टिक खाकर-पीकर जानलेवा बीमारियों से जल्द मर रहे

प्लास्टिक खाकर-पीकर जानलेवा बीमारियों से जल्द मर रहे

3 जुलाई “अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त” दिवस पर विशेष

पृथ्वी पर मानव ने अपनी सुविधा के लिए नवनवीन आविष्कार किये, परंतु जरूरत से ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हुआ, आज अपने सुख के लिए मानव प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके पृथ्वी को नष्ट करने पर तुला है, जबकि पृथ्वी पर मानव अस्तित्व के साथ ही सम्पूर्ण जीवसृष्टि के लिए भी धोखा निर्माण हो गया है, तेजी से बदलता जलवायु परिवर्तन मानव निर्मित कारणों का नतीजा है। अमेरिका के स्वतंत्र अनुसंधान संस्थान “हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट” की रिपोर्ट ने बताया कि 2021 में 81 लाख मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं, भारत में 21 लाख और चीन में 23 लाख मौत के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है, मौतों का यह आंकडा बहुत ही ज्यादा है। वायु प्रदूषण के साथ ही जल प्रदूषण, प्लास्टिक प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ई-कचरा, जैव-चिकित्सा अपशिष्ट, घातक रसायनों का प्रयोग, लाखों लोगों को हर साल घातक बीमारियों से जकड़कर असमायिक मौत दे रहे हैं। प्रदूषण से पशु-पक्षी, वन्यजीव, समुद्रजीव तेजी से ख़त्म हो रहे हैं। पृथ्वी पर प्लास्टिक प्रदूषण इस तरह से बढ़ा है कि अगर आज पूरे विश्व में प्लास्टिक बंदी हो जाए तो भी हजार साल उसका अस्तित्व वातावरण में नजर आयेगा। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज के वर्तमान युग में हम रोज प्लास्टिक खा रहे हैं, पी रहे हैं और प्लास्टिक मिश्रित ऑक्सीजन ले रहे हैं। वैश्विक स्तर पर, हर साल प्रति व्यक्ति संभावित रूप से 11,845 से 193,200 माइक्रोप्लास्टिक्स ग्रहण करता है, जो 7.7 ग्राम से 287 ग्राम प्रति व्यक्ति के बीच होता है, इसका सबसे बड़ा जरिया हमारा पीने का पानी है।

क्रिश्चियन चैरिटी समूह टियरफ़ंड द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि विकासशील देशों में हर 30 सेकंड में एक मौत के लिए प्लास्टिक कचरा जिम्मेदार है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हर साल चार लाख से दस लाख लोग कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरे के संपर्क में रहने के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारियों से मरते हैं। प्लास्टिक कचरे से हर साल 100 मिलियन समुद्री जीव मरते हैं, हर साल 100,000 समुद्री जीव प्लास्टिक में उलझने से जान गवांते है। गर्म खाद्य पदार्थों के लिए प्लास्टिक का प्रयोग जहर जैसा है क्योंकि जैसे ही प्लास्टिक का गर्म खाद्यपदार्थों से संपर्क होता है, तो प्लास्टिक अपने जहरीले रसायनों को छोड़ता है, जो खाद्यपदार्थों में मिलता है और उस खाद्य पदार्थों को खाकर इंसान जानलेवा बीमारियों का शिकार होता है, इसलिए प्लास्टिक प्रदूषण के द्वारा मौतों में लगातार वृद्धि हो रही है। प्लास्टिक में मौजूद जहरीले रसायन मानव शरीर में हार्मोन गतिविधि को बदल सकते हैं, प्लास्टिक में मौजूद विघटनकारी रसायन बांझपन, मोटापा, मधुमेह, प्रोस्टेट या स्तन कैंसर, थायरॉयड समस्याओं, हृदय रोग और स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ाते हैं। प्लास्टिक की थैलियों को फोटोडिग्रेड होने में लगभग 300 साल और कुछ प्लास्टिक को हजार साल तक लग जाते हैं। वे छोटे-छोटे जहरीले कणों में टूट जाते हैं जो मिट्टी और जलमार्गों को प्रदूषित करते हैं और जब जानवर, पशुपक्षी या समुद्रीजीव गलती से ये प्लास्टिक खा लेते हैं, तो वे खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं। प्लास्टिक को जलाने से उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि जलाने पर वे वायुमंडल में जहरीली गैसें छोड़ते हैं जो वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं।

हर साल 3 जुलाई को दुनियाभर में जनजागृति के लिए “अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस” मनाया जाता है, इस वर्ष की थीम “व्यक्तियों, व्यवसायों और संगठनों को प्लास्टिक के अन्य स्थायी विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें” यह है, प्लास्टिक के उपयोग और अपशिष्ट को कम करने के लिए नीतिगत परिवर्तनों और प्रणालीगत समाधानों पर जोर दें। प्लास्टिक बैग पेट्रोलियम उत्पादों से बने होते हैं, प्लास्टिक खाद्य भंडारण पैकेज में जहरीले रसायन होते हैं, प्लास्टिक उत्पादन के दौरान जहरीले रसायन निकलते हैं। साल 2050 तक महासागरों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक कचरा अधिक होगा। हर साल दुनिया भर में करीब 500 बिलियन प्लास्टिक बैग इस्तेमाल किए जाते हैं, यह बहुत ज़्यादा बैग हैं। दुनिया भर में हर सेकंड 160,000 प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है, जिनका जीवनकाल लगभग 12 से 25 मिनट है। दुनिया भर में हर मिनट लगभग दस लाख प्लास्टिक पेय की बोतलें बेची जाती हैं, प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्ययन 2022 अनुसार, हर साल 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक समुद्र में प्रवेश करता है, जो पानी में मिलकर खाद्य श्रृंखला को बाधित करता है। ईए की रिपोर्ट के अनुसार, भारत एमडब्ल्यूआई में चौथे स्थान पर है, जहां 98.55 प्रतिशत उत्पन्न कचरे का कुप्रबंधन किया जाता है। भारत में प्लास्टिक कचरे का उत्पादन पिछले पांच वर्षों में चार गुना हो गया है। सरकार का कहना है कि देश का 60% प्लास्टिक कचरा रिसाइकिल किया जाता है, जबकि सीपीसीबी डेटा पर आधारित सीएसई डेटा के मुताबिक, भारत अपने प्लास्टिक कचरे का केवल 12% ही रिसाइकल कर पाता है।

भारत देश में एकल उपयोग प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध है, बहुत बार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं महानगर पालिका या नगर निगम द्वारा दुकानों, कारखानों पर छापा मारकर प्लास्टिक थैलियों का अवैध माल जप्त किया जाता है। परंतु हम सभी जानते है कि पाबंदी के बावजूद बड़ी मात्रा में प्लास्टिक थैलियों का अवैध व्यापार और उपयोग धड़ल्ले से जारी है। दुकानदार के मना करने के बावजूद ग्राहक भी प्लास्टिक थैलियों की मांग करते है, ऐसे लोगों की बेवकूफी का खामियाजा अन्य लोगों और पर्यावरण को भुगतना पड़ता है, जिससे मासूमों जीवों की जान भी चली जाती है। बहुत बार हमें रास्ते, दुकान, स्ट्रीट वेंडर्स किराना दुकान, होटल, सब्जी भाजी फल वाले, खाद्यपदार्थ विक्रेता, छोटे-मोटे दुकानदार की तरफ बैन प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल नजर आता है। थैलियां इस्तेमाल हो रही है मतलब, ऐसी अवैध प्लास्टिक थैलियों का उत्पाद शुरू है।

पृथ्वी पर मानव अस्तित्व और जीवसृष्टि को बचाना है तो, प्लास्टिक का इस्तेमाल तुरंत बंद करना होगा, प्लास्टिक के अन्य पर्याय का अनुकरण करके पर्यावरण की रक्षा करनी होगी। लोग प्लास्टिक का अधिक उपयोग करने के आदी हो गये हैं। आलस और स्वार्थवृत्ति छोड़कर कपड़े या कागज की थैलियों का उपयोग करें, पैसे से ज्यादा प्रकृति को प्राधान्य दें। कानून और सरकारी नीति नियमों का पालन करें। कचरा निर्मित न हो या कम हो इसका ध्यान रखें। हर वस्तु के पुनर्चक्रण के बारे में सोचें। प्लास्टिक पैक खाद्य उत्पादों को खरीदने से बचें। एकल उपयोग वाले डिस्पोजेबल प्लास्टिक मना करें। बाहर प्लास्टिक पानी की बोतल खरीदने के बजाय घर से स्टील की बोतल लेकर निकलें। आज से 20-25 साल पहले जब खाद्य पैकेज का ट्रेंड नहीं था, किराना दुकान में खाद्य तेल खरीदने के लिए घर से केतली बर्तन लेकर जाते थे क्योंकि तब तेल के पैकेट नहीं आते थे, किराना सामान समाचार पत्रों की रद्दी के कागज में बांधकर देते थे क्योंकि तब प्लास्टिक की थैलियों नहीं मिलती थी। दूध कांच की बोतल में या घर के किसी बर्तन में लेकर आते थे।

एक बात हमेशा याद रखो कि ढूंढने से सौ बहाने मिलेंगे, लेकिन मेहनत से हर बात संभव होती है। 2008 में, छोटा सा गरीब देश रवांडा दुनिया के उन पहले देशों में से एक बन गया, जिसने सिंगल-यूज प्लास्टिक बैग और बोतलों पर प्रतिबंध लगा दिया, इस देश में प्लास्टिक की वस्तु के साथ पकड़े जाने पर छह महीने जेल की सजा है। सिक्किम, जो 1998 में डिस्पोजेबल प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला भारतीय राज्य बना, 2016 में, सिक्किम ने दो बड़े फैसले लिए, इसने सरकारी कार्यालयों और सरकारी कार्यक्रमों में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। केरल के कन्नूर में 25 लाख से ज़्यादा लोगों ने प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर दिया, ताकि यह दक्षिण भारत का पहला प्लास्टिक-मुक्त ज़िला बन सके। एक साल के भीतर, कन्नूर जिले में 40 लाख प्लास्टिक कैरी बैग कम हो गए। दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के दूरदराज के गांव सादिवाड़ा में, ग्राम पंचायत के मुखिया ने पर्यावरण को बचाने के लिए प्लास्टिक-मुक्त कहलाने वाला पहला गांव बनाने की एक अनूठी पहल शुरू की। असम के एक मॉडल स्कूल में छात्रों को स्कूल फीस के तौर पर हर सप्ताह 25 प्लास्टिक अपशिष्ट एकत्र करके लाना होता है, ताकि पर्यावरण सुरक्षित रहें। मेघालय के मावलिननॉन्ग गांव के पास स्थित दावकी झील को 2003 में एशिया का सबसे स्वच्छ गांव घोषित किया गया था। स्वच्छता के प्रति बेहद जागरूक ग्रामीणों ने प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। जनवरी 2020 में केरल के कुमारकोम पहला प्लास्टिक-मुक्त पर्यटन स्थल बन गया। प्लास्टिक मुक्त वातावरण बनाने के लिए पहल हम सबको मिलकर करनी होगी ताकि आनेवाली पीढ़ी के लिए यह जीवसृष्टि स्वच्छ हरीभरी बनी रहें।

लेखक- डॉ. प्रितम भि. गेडाम

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