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सब कुछ रह जाएगा!
चलती रहेंगी हवाएँ,
तू थम जाएगा।
महकते रहेंगे उपवन,
तू मुरझा जाएगा।
दुनिया की चाल यूँ ही चलेगी,
शहनाई की धुनें गूंजेंगी,
पर तू कहीं खो जाएगा।
वसंत फिर मुस्काएंगे,
कलियाँ फिर लजाएँगी,
नील गगन तारों से भर जाएगा,
प्रभात फिर उजियारा लाएगी,
सांझ फिर धुंधलाएगी,
लेकिन
तू फिर न आएगा।
कौन है यह मैं,
जो आता है अनायास,
और खो जाता है मौन में?
इस रहस्य को समझ ले,
इस ‘एक’ की पहचान कर ले,
इस मौन की स्मृति जगा ले,
जिसने इस ‘स्व’ को जान लिया,
उसने जीवन का अर्थ पा लिया।

रचनाकार
श्री जयवंत भुजबल